Friday, April 23, 2021

दूसरों के घरों बर्तन मांजने से लेकर ऑक्सफोर्ड तक का सफर, अब IPS बन किया नाम रोशन!

इल्मा ने बताया कि वो अपने सेंट स्टीफेंस में बिताये सालों को जीवन का श्रेष्ठ समय मानती हैं, जहां उन्होने बहुत कुछ सीखा, इधर बेटी को दिल्ली भेजने के कारण उनकी मां को खूब ताना सुनना पड़ता था।

इल्मा अफरोज जो यूपी के मुरादाबाद के एक छोटे से कस्बे की रहने वाली हैं, जिन्होने खेतों में काम करने से लेकर जरुरत पड़ने पर लोगों के घरों में बर्तन साफ करने तक का काम किया है, हालांकि उन्होने कभी हिम्मत नहीं हारी तथा देश सेवा के लिये आईपीएस अधिकारी बनीं। मुरादाबाद के छोटे से गांव कुंदरकी की रहने वाली इल्मा ने अपने गांव का नाम रोशन किया है, इल्मा के इतिहास को और उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा को देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता, कि ये लड़की दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी तथा न्यूयॉर्क तक भी जा सकती हैं।

पिता के निधन ने बदली जिंदगी
इल्मा के पिता की असमय मृत्यु हो गई थी, तब इल्मा 14 साल की थी, उनका भाई उनसे दो साल छोटा था, पिता के गुजरने से घर में अचानक मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा, इल्मा कि अम्मी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करें, तब लोगों ने सलाह दी, कि लड़की को पढाने में पैसे बर्बाद ना करके इसकी शादी कर दें, जिससे आपका बोझ कम हो जाएगा। पर इल्मा की अम्मी ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया, हमेशा अपने मन की करती रही, इल्मा हमेशा से पढाई में होशियार थी, इसलिये उनकी मां ने दहेज के लिये पैसा इकट्ठा ना करके उन पैसों से बेटी को पढाया, इल्मा ने अपनी मेहनत के दम पर स्कॉलरशिप पाना शुरु कर दिया, पूरी हायर स्टडीज स्कॉलरशिप्स के माध्यम से पूरी की।

मां को सुनना पड़ता था ताना
इल्मा ने बताया कि वो अपने सेंट स्टीफेंस में बिताये सालों को जीवन का श्रेष्ठ समय मानती हैं, जहां उन्होने बहुत कुछ सीखा, इधर बेटी को दिल्ली भेजने के कारण उनकी मां को खूब ताना सुनना पड़ता था, बेटी हाथ से निकल जाएगी, उसको पढाकर क्या करना है, वगैरह-वगैरह, लेकिन मां को बेटी पर पूरा भरोसा था, उन्होने किसी की नहीं सुनी, सेंट स्टीफेंस के बाद इल्मा को मास्टर्स के लिये ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जाने का मौका मिला। इसके बाद को गांव वालों तथा रिश्तेदारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी, यहां तक कह दिया कि लड़की गई हाथ से, अब वापस नहीं आएगी, यहां इल्मा की मां इतनी बातें सुन रही थी, तो दूसरी ओर बेटी अपने खर्चे के लिये कभी बच्चों को ट्यूशन पढा रही थी, तो कभी छोटे बच्चों की देखभाल का काम करती रही, .यहां तक कि उन्होने दूसरे के घरों में बर्तन भी धोये। पढाई के बाद इल्मा को न्यूयॉर्क में बढिया नौकरी का ऑफर मिला, वो चाहती तो आराम की जिंदगी विदेश में जी सकती थी, लेकिन उन्होने एक इंटरव्य़ू में बताया कि मेरी शिक्षा पर पहले मेरे देश का हक है, मैं अपनों को छोड़कर विदेश में क्यूं बसूं।

देश वापस लौटी
इल्मा जब न्यूयॉर्क से वापस लौटी, तो उनके मन में यूपीएससी का ख्याल आया, उनके भाई तथा मां ने उन्हें इसके लिये प्रेरित किया, इल्मा कहती हैं जब वो गांव वापस आती हैं, तो गांव को लोगों को लगता था कि बेटी विलायत से पढकर लौटी है, तो अब सारी समस्याएं खत्म कर देगी, किसी का राशन कार्ड बनना है, तो किसी को सरकारी योजना का लाभ लेना है, हर कोई मेरे पास एक उम्मीद लेकर आता था, इल्मा को लगा कि यूपीएससी ही एक ऐसा क्षेत्र है, जिसके द्वारा वो देश सेवा का सपना साकार कर सकती है, बस वो जुट गई तैयारी में, आखिरकार इल्मा ने 2017 में 217वीं रैंक हासिल की, जब सर्विस चुनने की बारी आई, तो उन्होने आईपीएस चुना, बोर्ड ने पूछा कि भारतीय विदेश सेवा क्यों नहीं, तो इल्मा ने कहा नहीं सर मुझे अपनी जड़ों को सींचना है, अपने देश के लिये काम करना है।

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