अजिंक्य रहाणे ने बताया कि उनके पिता की इनकम ज्यादा नहीं थी, ट्रेनिंग के लिये वो अपनी मां के साथ जाते थे, उनकी मां 8 किमी पैदल चलती थी।

वैसे तो क्रिकेट जगत में कई खिलाड़ियों के संघर्ष के कई किस्से मशहूर हैं, जिन्होने बदहाली से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट तक का सफर तय किया है, लेकिन इस कहानी से ज्यादातर लोग आज भी अंजान हैं, दरअसल ये कहानी टीम इंडिया के टेस्ट उपकप्तान अजिंक्य रहाणे की है, जिन्होने साल 2011 में इंग्लैंड दौरे पर डेब्यू किया था, इसके बाद पीछे पलटकर नहीं देखा।

निजी जीवन पर बात
हाल ही में एक निजी न्यूज चैनल को दिये इंटरव्यू में अजिंक्य रहाणे ने अपनी पर्सनल लाइफ पर खुलकर बात की, उन्होने बताया कि उन्हें क्रिकेटर बनाने में सबसे ज्यादा हाथ उनकी मां-पिता का है, रहाणे ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहा कि उनकी मां उनके ट्रेनिंग के लिये एक हाथ में भाई और एक हाथ में किट बैग लेकर 8 किमी पैदल चलती थी, क्योंकि मेरा परिवार रिक्शे का खर्चा नहीं उठा सकता था।

सप्ताह में 1 दिन रिक्शा
अजिंक्य रहाणे ने बताया कि उनके पिता की इनकम ज्यादा नहीं थी, ट्रेनिंग के लिये वो अपनी मां के साथ जाते थे, उनकी मां 8 किमी पैदल चलती थी, मां के एक हाथ में उनका छोटा भाई और दूसरे हाथ में किट बैग होता था, रहाणे ने कहा कि सप्ताह में सिर्फ 1 दिन ही मुश्किल से रिक्शे का सफर कर पाते थे, बाकी दिन पैदल ही जाना पड़ता था।

रिक्शे की जिद करते थे रहाणे
स्टार बल्लेबाज ने बताया कि कई बाद ट्रेनिंग से वो ज्यादा थक जाते थे, तो अपनी मां से रिक्शे से चलने के लिये कहते थे, लेकिन मां कोई जवाब नहीं देती थी, रहाणे ने कहा कि वो अपने माता-पिता की वजह से ही आज यहां तक पहुंचे हैं, अपने माता-पिता के लिये तो आज भी मैं वही पुराना अज्जू हूं।

पिता भी छोड़ने जाते थे
रहाणे ने अपने ट्रेन सफर के बारे में बताया कि जब वो 7 साल के थे, तो उनके पिता पहले दिन अपने साथ ले गये, डोंबिवली से सीएसटी तक उन्हें छोड़ा, फिर अपने काम पर गये, लेकिन अगले दिन कहा कि अब अकेले ही सफर करना होगा, इसके बाद पिता रोजाना डोंबिवली स्टेशन पर छोड़ देते थे, जहां से मैं ट्रेन लेता था, बाद में मुझे मालूम पड़ा, कि पिता बगल वाले डिब्बे में रहते थे, वो सीएसटी तक देखने के लिये आते थे कि मैं अकेले सफर कर सकता हूं, या नहीं, रहाणे ने बताया कि उन्हें वो सारे त्याग याद हैं, जो उनके परिवार ने उनके लिये किये।

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