हिमंत बिस्व सरमा 2001 से लगातार विधायक और मंत्री हैं, कहा जाता है कि वो हर मुश्किल हालात में काम करने के लिये तैयार रहते हैं।

असम में बीजेपी तथा एनडीए विधायक दल के नेता चुने जाने के बाद हिमंत बिस्व सरमा आज दोपहर सीएम पद की शपथ लेंगे, सर्बानंद सोनोवाल सीएम पद की रेस में पीछे रह गये और लंबी खींचतान के बाद सरमा ने बाजी मार ली, 2014 से अब तक सरमा की ताकत काफी बढी है, सवाल ये है कि आखिर क्यों लगातार दूसरी बार जीत के बावजूद सोनोवाल की जगह सरमा को तरजीह दी गई, आइये आपको इसके बारे में बताते हैं।

क्या है कारण
हिमंत बिस्व सरमा 2001 से लगातार विधायक और मंत्री हैं, कहा जाता है कि वो हर मुश्किल हालात में काम करने के लिये तैयार रहते हैं, उनकी इसी विशेषता का पुरस्कार उनके पूर्व मेंटर पूर्व कांग्रेसी सीएम हितेश्वर सैकिया और तरुण गोगोई ने भी दिया, उनका कद दिनों-दिन बढता रहा, गोगोई को उनकी महत्वाकांक्षा समझने के बाद मतभेद हुआ, जिसके बाद सरमा ने 2015 में कांग्रेस छोड़ दी, वो अमित शाह के साथ मुलाकात के बाद बीजेपी में शामिल हुए।

काम के दम पर जिम्मेदारी
हिमंत अपने काम के लिये जाने जाते हैं, कहा जाता है, कि जो वो ठान लेते हैं, तो उसे करके ही दम लेते हैं, फिर असम में चाहे सीएए का मुद्दा हो या फिर एनआरसी का, वो वहां के लोगों की भावनाओं को समझने का दावा करते हैं, उन्हें ये अच्छे से पता है कि वहां के लोग क्या चाहते हैं, वो कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों के साथ सालों तक काम करने का अनुभव रखते हैं।

जमकर की मेहनत
असम में वित्त मंत्री रहते हुए सरमा ने जमकर काम किया, असम ऐसा पहला राज्य था, जहां सबसे पहले जीएसटी लागू किया गया, इसके अलावा उन्होने असम की सबसे लोकप्रिय अरुनोदय स्कीम को लांच किया, जिसके तहत हर बेरोजगार महिला को सलाना 8 हजार रुपये दिये गये।

अमित शाह के खासमखास
कहा ये भी जा रहा है कि अमित शाह के करीबी होने का उन्हें फायदा मिला, इसमें कोई शक नहीं है कि असम में सोनोवाल के बाद वो दूसरे नंबर के नेता था, सरमा की बीजेपी के खेमे में काफी मजबूत पकड़ है, उन्हें प्रदेश के हर बड़े फैसले में शामिल किया जाता है, सरमा को बीजेपी ने तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सर्बानंद सोनोवाल के साथ असम में बीजेपी चुनाव प्रबंधन समिति का समन्वयक बनाया, 2016 में पार्टी सत्ता में आई, तो उन्हें सोनावाल सरकार का सबसे ताकतवर मंत्री बनाया गया।

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