तेज प्रताप दौड़ते रह गये, तेजस्वी ने कर दिया खेल, लालू की पार्टी में एकाधिकार की ये है इनसाइड स्टोरी

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तेज प्रताप अपने बेबाक और दिलचस्प बयानों की वजह से मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं, 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान भी उनके कहने पर जब उनके लोगों को टिकट नहीं दिया गया, तो उन्होने बगावती तेवर दिखाते हुए अपनी ही पार्टी के खिलाफ उम्मीदवार मैदान में उतार दिया था।

लालू यादव की पार्टी में मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं, दरअसल विधान परिषद चुनाव के लिये कुछ नामों को जबरदस्त चर्चा थी, कहा जा रहा था कि लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप इस साल विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, वो अपने लिये विधान परिषद में सीट पक्की करवाना चाह रहे थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया है, राजद ने तीन नामों पर मुहर लगा दी है, जिसमें बिस्कोमान के अध्यक्ष सुनील सिंह, फारुख शेख और रामबली चंद्रवंशी का नाम शामिल है।

जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश
लालू की गैरमौजूदगी में पार्टी और परिवार की जिम्मेदारी संभाल रहे तेजस्वी यादव ने जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश की है, इसी के तहत राजपूत समाज से सुनील सिंह, मुस्लिम समाज से फारुख शेख और पिछड़ों के नेतृत्व के लिये रामबली चंद्रवंशी को उम्मीदवार बनाया गया है, तेज प्रताप एमएलसी उम्मीदवार बनने के लिये खूब हाथ-पैर मार रहे थे, लेकिन रणनीति के तहत तेजस्वी ने ये कहकर उनका नाम किनारे कर दिया, कि पार्टी पर परिवारवाद बढाने का आरोप लगेगा।

किनारे हो रहे तेज प्रताप
पिछले पांच सालों से तेज प्रताप यादव किसी ना किसी वजह से लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं, कुछ समय पहले तक वो अपनी पत्नी के साथ मनमुटाव और तलाक की खबरों की वजह से चर्चा में थे, अब तेजस्वी धीरे-धीरे करके पार्टी पर अपनी मजबूत पकड़ बना रहे हैं और तेजू किनारे हो रहे हैं, तेजू के समर्थकों ने राजद ऑफिस में उन्हें उम्मीदवार बनाये जाने को लेकर खूब हो-हल्ला मचाया था, हालांकि इसका भी असर तेजस्वी के फैसलों पर नहीं पड़ा।

लालू ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया
आपको बता दें कि लालू यादव ने 2015 में ही इशारों में घोषणा कर दिया था, कि उनका उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव होंगे, महागठबंधन सरकार में उन्हें डिप्टी सीएम बनाया गया था, हालांकि लालू तब जेल से बाहर थे और तेज प्रताप को भी स्वास्थ्य मंत्रालय दिया गया था, खुद लालू अपने बड़े बेटे के मामले में दखल देते थे, उन्हें आगे बढाने की कोशिश करते थे, लेकिन जब से वो जेल गये हैं, तब से तेजस्वी उन्हें किनारे करने में लगे हुए हैं, अब तेज प्रताप ना तो पार्टी की मीटिंग में दिखते हैं और ना ही चुनाव प्रचार में उनका वैसा रोल होता है।

पार्टी के खिलाफ भी उठा लेते हैं झंडा
दरअसल तेज प्रताप अपने बेबाक और दिलचस्प बयानों की वजह से मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं, 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान भी उनके कहने पर जब उनके लोगों को टिकट नहीं दिया गया, तो उन्होने बगावती तेवर दिखाते हुए अपनी ही पार्टी के खिलाफ उम्मीदवार मैदान में उतार दिया था और खुद प्रचार के लिये गये थे, जिससे पार्टी की खूब फजीहत हुई थी।

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