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दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की प्रोफेसर विजया लक्ष्मी सिंह कहती हैं, कि भारत-अफगानिस्तान का रिश्ता सदियों पुराना है, कुछ इतिहासकार भारत-अफगानिस्तान संबंध को सिंधु सभ्यता से जोड़ते है।

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद वहां के हालात तेजी से बदल रहे हैं, पूरे देश में तालिबानियों के डर से अफरा-तफरा का माहौल बना हुआ है, दुनिया के अलग-अलग देश अपने हिसाब से तालिबान की इस हरकत को जायज-नाजायज ठहराने में जुटे हैं, लेकिन अब तक दुनिया के किसी भी मुल्क में अफगानिस्तान में शांति बहाली के कोई प्रयास नहीं किये हैं।

आम जनता बेहाल
अफगानिस्तान में आम जनता बेहाल है, महिलाओं तथा बच्चों का बुरा हाल है, दुनिया भर से समीक्षक अफगानिस्तान के मसले पर अमेरिका की नाकामियों को गिनाने में जुटे हैं, उनका कहना है कि 20 साल तक अफगानिस्तान में रहने के बाद भी अमेरिकी फौज अफगान सरकार तथा यहां की फौज को इतनी ताकत नहीं दे पाये, कि वो तालिबानियों का तनिक भी सामना कर पाये, तालिबान के मसले को सुलझाने के लिये एक्सपर्ट अपने हिसाब से मशविरा दे रहे हैं।

भारत की सीमा में मिला लिया था
कबीला संस्कृति वाले अफगानिस्तान में अमेरिका तथा रुस दोनों की बारी-बारी से विफलता के बाद सवाल उठ रहे हैं, कि क्या इस जगह पर कभी कोई ताकत शांति बहाली नहीं कर सकता है, ऐसे में भारतीय इतिहास के पन्ने पलटने पर ऐसी घटना याद आती है, जिसमें बिहार के एक शासक ने बिना युद्ध कूटनीतिक का प्रयोग कर अफगानिस्तान को भारत की सीमा में मिला लिया था, आइये इतिहास के जरिये उस महाप्रतापी सम्राट चंद्रगुप्त की कहानी को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं, जिसने बिना युद्ध के अफगानिस्तान की सीमा को भारत का हिस्सा बनाया था।

सदियों पुराना रिश्ता
दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की प्रोफेसर विजया लक्ष्मी सिंह कहती हैं, कि भारत-अफगानिस्तान का रिश्ता सदियों पुराना है, कुछ इतिहासकार भारत-अफगानिस्तान संबंध को सिंधु सभ्यता से जोड़ते है, प्राचीन काल में शोर्तुगई ट्रेड कॉलोनी में आमू दरिया थी, जो व्यापार के लिये इस्तेमाल किया जाता था। जस्टिन और ग्रीक-रोमन इतिहासकार प्लूटार्क महान भारतीय शासक चंद्रगुप्त मौर्य और अलेक्जेंडर के बीच रिश्ते का जिक्र करते हैं, अलेक्जेंडर के सेनापति सेल्युकस ने एक बार मौजूदा अफगानिस्तान (तब कंधार हुआ करता था) को जीत लिया था, पश्चिमी भारत के सरहद तक धमक दिखा दी थी। ऐसे में चंद्रगुप्त मौर्य भी सरहद की सुरक्षा के लिये वहां जा पहुंचे, दोनों में जंग छिड़ गई, ये युद्ध एक संधि के साथ खत्म हुआ, इसके तहत 305 ईसा पूर्व में सेल्युकस ने चंद्रगुप्त मौर्य को अफगानिस्तान सौंप दिया था, सबसे खास बात ये है कि इस जंग के बाद मौर्य साम्राज्य और प्राचीन ग्रीक साम्राज्य के बीच कूटनीतिक रिश्ते कायम हो गये।

500 हाथी
प्रोफेसर विजया बताती हैं कि ग्रीक साम्राज्य में कंधार के अलावा अफगानिस्तान के दूसरे इलाके और भारत पर चंद्रगुप्त का आधिपत्य स्वीकार कर लिया था, इस दोस्ती के बदले चंद्रगुप्त मौर्य ने महावतों के साथ 500 हाथी, मुलाजिम, सामाग्री और अनाज यूनान भेजे थे। कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि सेल्युकस ने अपनी बेटी हेलन की शादी चंद्रगुप्त मौर्य से की, हालांकि इसका आधिकारिक जानकारी कहीं नहीं मिलती है। चंद्रगुप्त वंशज के ही महान सम्राट अशोक ने भी अफगानिस्तान पर शासन किया, इस इलाके में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया, अशोक के शासनकाल में अरमिक और ग्रीक दोनों भाषा अफगानिस्तान के इन इलाकों में बोली जाती थी।

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